क्या महर्षि वाल्मीकि द्वारा जपा हुए मंत्र सही है?
महर्षि वाल्मीकि के बारे में संत रामपाल जी महाराज के विचार🤭
प्रश्न:- महर्षि बाल्मिकी जी तो सत्ययुग में हुए थे, वे भी राम-राम जपते थे। क्या यह मन्त्रा भी शास्त्रा प्रमाणित नहीं हैं? उत्तर:- पूर्व में बताया है कि गीता अध्याय 4 श्लोक 1.2 में गीता ज्ञान दाता ने बताया है कि यह ज्ञान मैंने सूर्य को सुनाया था। उसने अपने पुत्रा मनु जी को सुनाया। फिर कुछेक राजऋषियों को प्राप्त हुआ। सत्ययुग के प्रारम्भ में ही ये सब सूर्य, मनु व राजर्षि हुए हैं। उनके बाद यह ज्ञान नष्ट हो गया था। महर्षि बाल्मिकी जी को सप्त ऋषि मिले थे। उन्होंने तपस्या करके सिद्धियाँ प्राप्त की थी। वही हठयोग करके तप विधि महर्षि बाल्मिकी जी को उन्होंने बता दी। जिस हठ योग तप को महर्षि बाल्मिकी जी ने तन-मन से श्रद्धा से किया। कुछ समय उपरान्त शरीर के ऊपर के भाग (सिर) में से आवाज सुनाई दी थी। वह थी “राम-राम”। उसी शब्द का उच्चारण महर्षि बाल्मिकी जी तपस्या के दौरान करने लगे। सुनने वाले को ऐसा लगता है जैसे ये मरा, मरा बोल रहे हैं, वास्तव में राम-राम का ही उच्चारण करते थे। उनको तपस्या का परिणाम मिला, उनमें सिद्धियाँ प्रवेश हो गईं। उनकी दिव्य दृष्टि खुल गई। जिस कारण से उन्होंने श्री रामचन्द्र जी के जन्म से हजारों वर्ष पूर्व ही रामायण अर्थात् श्री रामचन्द्र जी के जन्म की जीवन की सर्व घटनाऐं लिख दी थी, ग्रन्थ का नाम है “बाल्मिकी रामायण” जो संस्कृत भाषा में लिखी गई थी। राम-राम के जाप से कोई आध्यात्मिक लाभ नहीं होता। परंतु परमात्मा का बोधक शब्द होने से उच्चारण करने से परमात्मा की भूल नहीं पड़ती। इसलिए राम-नाम के उच्चारण का प्रचलन हिन्दू धर्म में प्राचीन समय से है। जैसे स्वामी रामानन्द जी राम-राम शब्द से सम्बोधित करते थे। उसके शिष्य भी एक-दूसरे को राम-राम से सम्बोधित करते थे, परन्तु जाप मन्त्रा “¬” था। इसी प्रकार हम कबीर पंथी “सत साहेब” बुलाते हैं। हमारा जाप मन्त्रा अन्य है। उसी भक्ति से भगवान तक जाया जाता है। सूक्ष्म वेद में कहा है:- सतगुरू मिले तो इच्छा मेटै, पद मिल पदै समाना। चल हंसा उस लोक पठाऊँ, जो अजर अमर अस्थाना। चार मुक्ति जहाँ चम्पी करती, माया हो रही दासी। दास गरीब अभय पद परसै, मिलै राम अविनाशी।।
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Perfect true thought
ReplyDeletePerfect true
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